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सांस्कृतिक विरारसत को अक्षुण्ण रखने में संस्कृत की महती भूमिका – मृत्युंजय बच्चों में नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए संस्कृत शिक्षा जरूरी

बच्चों में नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बाल्यकाल से शुरु करने की आवश्यकता है। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है। सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने में इस भाषा की महती भूमिका है। संस्कृत एवं संस्कृति परस्पर एक दूसरे के पूरक है। इसके लिए प्राथमिक कक्षा से ही नैतिक शिक्षा पर बल देना होगा। ये बातें बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने बिक्रमगंज में भाजपा कार्यालय में आयोजित अपने अभिनंदन समारोह में कही। उन्होंने कहा कि बिहार संस्कृत बोर्ड को डिजिटलाइजेसन करने के लिए वेबसाइड लॉन्च करने की दिशा में कार्य चल रहा है। पाठ्यक्रम को नीप-2020 के मानको के अनुरूप विशेषज्ञों की टीम पाठ्यक्रम का संशोधन एवं संवर्धन का कार्य कर रही है। पाठ्यक्रम में रामचरित मानस, श्रीमद्भागवत गीता, बिहार के विभूतियों, राष्ट्र नायकों एवं भारतीय संस्कृति का का पाठ्यांश समाहित करने का आग्रह किया गया है। पाठ्यक्रम में कौशल विकास एवं रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर विशेष बल देने का प्रयास किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व विधायक राजेश्वर राज ने किया। इस अवसर पर विधान पार्षद निवेदिता सिंह, नवीन चंद साह, रितेश राज, गौतम तिवारी आदि थे।

CHANDRAMOHAN CHOUDHARY
Author: CHANDRAMOHAN CHOUDHARY

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